Monday, April 23, 2012

पलाश ...

जी चाहे उतना घोलने दो, उन्हें जहर पानी में 
हम पीकर, उसे भी अमृत बना लेंगे ! 
... 
बिना माली, और बगैर बहारों के भी, हम खिल रहे हैं 'उदय' 
पलाश सही, पर दिल को - मन को - आँखों को, भाते तो हैं !
... 
उसने एक बार छूकर मुझे, अपना बना तो लिया है 'उदय' 
पर डर है, दोबारा न छुआ तो, कहीं मैं पत्थर न हो जाऊं ! 

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